ज़िन्दगी – एक उलझन

कभी एक पल में ही
खुशियों की बौछार हो जाती है;
कभी दूर दूर तक 
मुस्कुराने की वजह नज़र नहीं आती है.


कभी जिसको देख के

चेहरा ख़ुशी से झूम उठता है;
कभी उसी को देख के
दिल नफरत के कुए से पानी भरता है.


कभी छोटी सी गलती की सजा

मरते दम तक भुगत ते रहते है;
कभी बड़ी बड़ी गलतियों को भी
जाने अनजाने में अनदेखा कर देते है.


छोटी छोटी जीतो में छुपी हुई

वो बड़ी हार दिखाई नहीं देती;
भूले बिसरे गीतों में खोयी हुई
वो अनकही दास्ताँ सुनाई नहीं देती.


छोटी छोटी मुश्किलों में

ज़िन्दगी के बड़े सवाल कही खो जाते है;
बनते बिगड़ते रिश्तो में
जज़बातो के मायने कही ग़ुम हो जाते है.


कभी छोटी छोटी खुशियों में

ज़िन्दगी के सारे ग़म भूल जाते है;
और कभी हलके फुल्के संवादों में
सारी समस्याओं के हल निकल आते है.


सही गलत करते करते

ज़िन्दगी यूँ ही हाथ से फिसल जाती है;
और मौत करीब आते आते
सही गलत की परिभाषा ही बदल जाती है.


हस्ते रोते, गिरते संभलते

ये यूँ ही हमेशा
आगे बढ़ती जाती है;
ये ज़िन्दगी भी अजीब उलझन है
न कभी सुलझती है
न कभी समझ आती है.

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