कितना आसान होता है – Privilege, a poem

कितनी आसानी से लोग कह देते है
“चिंता करके कुछ नही होनेवाला| जो हो गया है उसे स्वीकार कर लो”
कभी कभी लगता है,
भगत सिंह ने भी ग़ुलामी बस स्वीकार कर लेनी चाहिए थी|

या जब लोग कहते है
“जो हो रहा है वो उतना बुरा भी नही है”
तो समझ नही आता
की जितना बुरा है, वो भी क्यों सहे|

अपने महफूज़ घर में बैठकर,
मलमल के बिस्तर पे लेटकर,
आराम से कह देना
“सब ठीक हो जाएगा”
कितना आसान होता है|

जब तक हमे तकलीफ नही पोहोच रही
जब तक हमे असुविधा नही हो रही
जब तक हमारे अपनों की जान खतरे में नही है-
शांत रहना,
स्थिरता रखना,
क्तिना आसान होता है|

भारत में रहकर
मुसल्मानो की तकलीफो को अनदेखा कर देना
कितना आसान होता है|
एक आदमी होकर
औरतो पे होनेवाले शोषण को अनदेखा कर देना
कितना आसान होता है|

पर किसी और देश में जब भारतीयों पे हमला होता है,
तब न जाने उन्हें अनदेखा करना
क्यों आसान नही होता है|
जब अपने घर की औरतो पे कोई बुरी नज़र डाले,
तब न जाने उसे बस भूल जाना
क्यों आसान नही होता है|

काश दुसरो के लिए सहानूभूति रखना
भी आसान होता|
काश दुसरो की दिक्कतों को समझना
थोड़ा आसान होता|

और समझ नही पाए
तो कम से कम
उनकी मुश्किलो को यूँ धुत्कारना और अनदेखा कर देना
काश इतना आसान नहीं होता|

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