बदलती ज़िन्दगी

Rains

Rains

ये बारिश की बूँदें
गीली मिट्टी की खुशबू
पल पल तड़पती, बेचैन
मेरे तन्हा दिल की आरज़ू

बचपन की यादें
पहले बारिश की भिगन
माँ के हाथ के पकौड़े
रेडियो पे पुराने गानो का चलन

बेझिझक बारिश में नाचता,
मेरा मासूम बचपन
बेपरवाह खेलता, गाता
मेरे दोस्तों का संघटन

आज भी भीगने का मन करता है
पर वक़्त की कमी का बहाना होता है
जानते है मन की ख़ुशी सबसे बड़ी होती है
पर ख़ुशी से कीमती, हाथ की घडी होती है

जेब में कुछ पैसे है
बस्ते में कुछ चीज़ें है
मन में डर बीमारी का है
कंधो पे बोझ ज़िम्मेदारी का है

गीली मिट्टी की खुशबू अब भी हमको भाति है
पर कमरे से ही अब, ये बारिश सुहाती है
बचपन के बेफिक्र दिनों की कमी खलती है
पर शायद इसी तरह से, ये ज़िन्दगी बदलती है.

ज़िन्दगी – एक उलझन

कभी एक पल में ही
खुशियों की बौछार हो जाती है;
कभी दूर दूर तक 
मुस्कुराने की वजह नज़र नहीं आती है.


कभी जिसको देख के

चेहरा ख़ुशी से झूम उठता है;
कभी उसी को देख के
दिल नफरत के कुए से पानी भरता है.


कभी छोटी सी गलती की सजा

मरते दम तक भुगत ते रहते है;
कभी बड़ी बड़ी गलतियों को भी
जाने अनजाने में अनदेखा कर देते है.


छोटी छोटी जीतो में छुपी हुई

वो बड़ी हार दिखाई नहीं देती;
भूले बिसरे गीतों में खोयी हुई
वो अनकही दास्ताँ सुनाई नहीं देती.


छोटी छोटी मुश्किलों में

ज़िन्दगी के बड़े सवाल कही खो जाते है;
बनते बिगड़ते रिश्तो में
जज़बातो के मायने कही ग़ुम हो जाते है.


कभी छोटी छोटी खुशियों में

ज़िन्दगी के सारे ग़म भूल जाते है;
और कभी हलके फुल्के संवादों में
सारी समस्याओं के हल निकल आते है.


सही गलत करते करते

ज़िन्दगी यूँ ही हाथ से फिसल जाती है;
और मौत करीब आते आते
सही गलत की परिभाषा ही बदल जाती है.


हस्ते रोते, गिरते संभलते

ये यूँ ही हमेशा
आगे बढ़ती जाती है;
ये ज़िन्दगी भी अजीब उलझन है
न कभी सुलझती है
न कभी समझ आती है.