बेगाने

न तुमने हमसे कुछ कहा
न हमने तुमसे कुछ कहा
सब कुछ अजनबियों से कहने लगे
अपनों और अजनबियों में अब फरक ही कहा रहा
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अधूरी बातें अधूरी रह गयी
अनकही बातो को तो वक़्त ही न मिला ;
सब कुछ कह गया तुम्हारा ज़मीर
हमारी खामोशी को तो मौका ही न मिला
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बेबस जज़्बात मेरे, मजबूरी में धस गए
दिल की कश्ती को कोई किनारा न मिला ;
बेचैन अफ़सोस मेरे लावारिस हो चले
तुम्हारे चैन
सुकून को लेकिन, उनका ठिकाना न मिला |

गीले शिकवे भी अब किस काम के
इनपे अब हमारा कोई हक़ ही न रहा ;
ये सब तो रिश्तो के नतीजे है
यहाँ तो अब कोई रिश्ता ही न रहा
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***

अजीब हो चला है वक़्त
हम ज़ाया कर रहे है
,
फिर भी ये बीत नही रहा ;

ज़िन्दगी भी सस्ती हो चली है
हम खर्च कर रहे है
,
पर कोई खरीद नही रहा |

 

इश्क भी बदल रहा है करवट
पहले खुशिया ही खुशिया थी
अब दर्द के सिवा कुछ दिख नही रहा

तुम भी बेगाने से लगने लगे हो अब
पहले तुम्हारी आदतें सही लगती थी
अब तुम्हारी हरकतें
, दिल समझ नही पा रहा |

 

रिश्ते भी कितने अजीब होते है

किसी के साथ प्यार से ज़िन्दगी बिताने की कोशिश करो
तो सालों तक इंसान कोशिश ही करता रह जाता है ;
और उसी इंसान को ज़िन्दगी से निकालने की कोशिश करो
तो कभी कभी ज़िन्दगी भर उस एक इंसान को भुला नही पाता है
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***

अब क्या नाम दे तुम्हे, समझ नही आ रहा

दोस्तकह नही पा रहे,
दुश्मनदिल को भा नही रहा ;
अनजानेतुम हो नही,
और अजनबीदिल बुला नही पा रहा |

शायद ‘बेगाना’ बुलाना सही रहेगा तुम्हे
क्यूंकि अपना अब तुम्हे कह नहीं सकते ;
बेगाना कहने में भी लेकिन एक अपनापन है
जो चाहे भी तो हम बदल नही सकते
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